hidustannews

अंतरराष्ट्रीय कारोबार जगत की यह पुरानी बहस है कि तेल (पेट्रोल) दुनिया की राजनीति तय करता है या दुनिया की राजनीति तेल के दाम तय करती है। फिलहाल तो दूसरी ही बात सच होती दिख रही है। अक्तूबर के महीने तक आसमान में पहुंच चुकी तेल की कीमतें अचानक नीचे आनी शुरू हो गई थीं। नवंबर का अंत आते-आते वे 30 प्रतिशत तक गिर गईं। इतने कम समय में इतनी तेज गिरावट तो 2015 में भी नहीं हुई थी, जिसे तेल की बड़ी मंदी वाला वर्ष मानते हैं। तेल उत्पादन करने वाले देशों में अचानक ही यह डर पैदा हो गया था कि कहीं इस बार हाल उस मंदी से भी बुरा न हो। हालांकि भारी मात्रा में तेल का आयात करने वाले भारत जैसे देशों के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती थी। लेकिन दिसंबर आते-आते इस उम्मीद पर विराम लग गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें अब अचानक ही पांच फीसदी बढ़ गई हैं। इसका सबसे बड़ा कारण तो यह बताया जा रहा है कि अमेरिका और चीन के बीच पिछले कुछ समय से जो व्यापार युद्ध चल रहा था, उस पर फिलहाल विराम लगाम लग गया है। यह युद्ध विराम फिलहाल 90 दिनों के लिए है, जिस दौरान अमेरिका और चीन आपसी मसलों पर बातचीत करेंगे। बेशक अमेरिका और चीन की बातचीत का तेल की कीमतों से कोई सीधा नाता नहीं है, लेकिन इससे विश्व उद्योग जगत को जो सकारात्मक संकेत मिले हैं, वे पहले भी कीमतें बढ़ने का कारण बनते रहे हैं। एक अन्य कारण यह भी है कि तेल के दो सबसे बड़े निर्यातकों सऊदी अरब और रूस ने आपस में बातचीत करके उत्पादन कम करने का फैसला किया है, ताकि कीमतों को गिरने से रोका जा सके। तेल की कीमत का बढ़ जाना यह संकेत तो देता ही है कि उनकी रणनीति कामयाब रही है।
हालांकि उनकी यह रणनीति कितने अरसे तक कितनी कामयाब रहेगी, यह कहना अभी थोड़ा मुश्किल है। खासकर तब, जब तेल निर्यात करने वाले देशों के संगठन ओपेक में ही फूट पड़ती दिख रही है। कतर ने अगले महीने से खुद को ओपेक से अलग करने का एलान कर दिया है। बेशक, इसका कारण सऊदी अरब और कतर का आपसी झगड़ा है, लेकिन इसका पेट्रोल की राजनीति पर असर पड़ना भी तय है। यह ठीक है कि ओपेक के बाकी सदस्यों के मुकाबले कतर पेट्रोल का सबसे छोटा निर्यातक है, लेकिन अब जब यह इस संगठन से अलग हो गया है, तो उत्पादन में कटौती के ओपेक के अनुशासन से भी बाहर हो गया है। अभी तक पेट्रोलियम उत्पादन में थोड़ी सी कमी-बेशी बाजार को तेजी से बदलती रही है, इसलिए कतर ओपेक के गणित को तो खराब कर ही सकता है। फिर पेट्रोल में भले ही वह पीछे हो, लेकिन प्राकृतिक गैस के बाजार का वह बड़ा खिलाड़ी है।
तेल की कीमतों के बढ़ने के क्या नतीजे हो सकते हैं, इसके लिए हमें फ्रांस जाना होगा। वहां पर्यावरण के लिहाज से नए टैक्स लगाने के कारण पेट्रोल और गैस आदि ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ीं, तो पिछले सप्ताहांत में दंगे भड़क उठे। जाहिर है कि पेट्रोल की कीमतों ने फ्रांस जैसे देश की राजनीति पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। यह बताता है कि भारत में हम भले ही पेट्रोल की बढ़ती कीमतों को लेकर रोना रोते रहते हों, लेकिन यह मसला दुनिया भर के लोगों को परेशान कर रहा है और हर जगह यह राजनीतिक मसला भी है।

Source: hidustannews

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *